शुक्रवार, 10 फरवरी 2012

पत्नियाँ

डूबती इक नाव होती आदमी की जिंदगी,
ग़र न होतीं जिंदगी में मुस्कुराती पत्नियाँ।

बेसुरा संगीत होती आदमी की जिंदगी,
ग़र न होतीं जिंदगी में गुनगुनाती पत्नियाँ।

गूंजता अट्टहास होती आदमी की जिंदगी,
ग़र न होतीं जिंदगी में खिलखिलाती पत्नियाँ।

मौन सा आकाश होती आदमी की जिंदगी,
ग़र न होतीं जिंदगी में गीत गातीं पत्नियाँ।

खाली बर्तन जैसे बजती आदमी की जिंदगी,
ग़र न होतीं जिंदगी में टनटनाती पत्नियाँ।

बिन मसाला मिर्च होती आदमी की जिंदगी,
ग़र न होतीं जिंदगी में सनसनाती पत्नियाँ।

कितनी बेआवाज होती आदमी की जिंदगी,
ग़र न होतीं जिंदगी में खनखनाती पत्नियाँ।

रेंगती रफ़्तार होती आदमी की जिंदगी,
ग़र न होतीं जिंदगी में सरसराती पत्नियाँ।

बंधा बिस्तरबंद होती आदमी की जिंदगी,
ग़र न होतीं जिंदगी में कुरमुराती पत्नियाँ।

3 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

जीवन को जीवंत बनाती पत्नियाँ , सुंदर लिखा है

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन...

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