शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

सतपुली के शैतान
दिनेश ध्यानी/04/08/2017
उत्तराखण्ड की शान्त वादियों को भी लगता है किसी शैतानी ताकत की बुरी नजर लग गई है। अगर ऐसा न हुआ होता तो चन्द दिनों के अन्तराल के बाद फिर से सतपुली में शैतान अपनी घिनौनी हरकत से देवभूमि को नापाक करने की हिमाकत कदापि नही करते। पहले हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्ति के साथ अभद्रता और फिर गौवंश के साथ कुकृत्य लगता है कुछ शैतानों द्वारा सोची समझी शाजिस के तहत ये सब किया जा रहा है। इन्हें पता है कि कोई कहने सुनने वाला है नही इसलिए जो जी में आये करें। पिछले साल कोटद्वार के दंगे तो लोगों को याद ही होंगे। अब ये आग शहर से होते हुए शान्त पहाड़ की वादियों को भी अपनी चपेट में लेने लगी है।
भले ही कुछ राजनेता और स्थानीय प्रशासन भी इसे आम घटना कहकर इस शाजिस को टाल दें, कुछ राजनैतिक दल इस वीभत्स घटना की आड़ में अपना वोट बैंक भी साधने का काम कर सकते हैं जैसा कि पूर्व में भी उत्तराखण्ड में ऐसे षडयन्त्र सामने आ चुके हैं कि कुछ दल और नेता वोट और कुर्सी के लिए कुछ भी कर सकते हैं किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। अगर ऐसा न हुआ होता तो उत्तराखण्ड के सुदूर गांवों, कस्बों में इस प्रकार के अपराधी तत्व हाबी न हुए होते।
पिछले वर्षों में एक बहुत बड़ी शाजिस के तहत लोगों को बहताफुसलाकर और भय दिखाकर भ्रमित किया जा रहा है। इसका ताजा उदाहरण उत्तराखण्ड के गांवों में शाजिसन मजार बनवाकर आने वाले कल के लिए जमीन तैयार की जा रही है। एक वाकया नैनीडांडा विकासखण्ड के डंुगरी गांव का है लगभब दसेक साल पहले यहां के एक युवा को रामनगर में किसी झाड़फूंक वाले मौलवी ने बताया कि तुम पर शैतानी ताकत है इसलिए तुम्हें रोज सुबह शाम मजार पर अगरबत्ती जलानी होगी। जब उस युवक ने कहा कि मैं गांव मेें रहता हूं तो मौलवी ने कहा कि तुम रामनगर तो रोज आ नही सकते इसलिए अपने घर के पास एक मजार बनवा लो और उसमें सुबह शाम अगरबत्ती जलाते रहो। इसी प्रकार हाल ही में बीरोखाल विकासखण्ड अन्तर्गत भी बीरोंखाल बाजार के समीप एक मजार बनावाई गई और देहरादून के विरसणी क्षेत्र जो कि विकासनगर के अन्तर्गत आता है वहां भी एक किसान को अपने खेत में मजार बनवाकर सुबर शाम अगरबत्ती दिखाने की हिदायत दी गई। इन सब बातों से साबित होता है कि किसी सोची समझी शाजिस के तहत ये सब हो रहा है। लेकिन हमारे नेता और प्रशासन सोया हुआ है या सोने का नाटक कर रहा है।
देश का आम नागरिक किसी भी जाति, धर्म और सम्प्रदाय से हो कहीं भी अपनी आजीविका कमा सकता है कहीं भी रह सकता है। लेकिन जब शाजिसन किसी समाज को या समुदाय को निशाना बनाया जाता है, अपनी शाजिसों से दूसरे समाज को नीचा दिखाने के कुकृत्य रचें जाते हों तो फिर जागरूक समाज को सोचना पड़ता है और अगर समाज जागरूक न हो और वो इन शािजसों को न समझे तो उसे तथा उसकी आने वाली नस्लों को इन षड़यन्त्रों को दंश झेलना लाजमी हो जाता है।
उत्तराखण्ड के शहरों, बाजारों और कस्बों के अतिरिक्त गांवों से लेकर हिन्दू धर्म के उत्तराखण्ड में महत्वपूर्ण तीर्थों तक सब जगह हर धर्म सम्प्रदाय के लोग देश के कोने-कोने से आकर अपनी जीविका उर्पाजन करते रहते हैं। इस हेतु किसी को कभी कोई द्वेष परिलक्षित नही हुआ। यह उत्तराखण्ड समाज और इस क्षेत्र की सहिष्णुता ही है कि अपने लोग खुद असुविधा में हों लेकिन बाहर से आये लोगों की सुविधा का ख्याल पहले रखते हैं। यही कारण है कि देश समाज में जहां आज कोई अजनवी लोगों से बात तक नही करते वहीं पहाड़ में आज भी बाहर व्यक्ति चाहे वह राहगीर हो, व्यापारी हो उसे बिना नाम, जाति, धर्म पूछे लोग अपने घरों में जगह देते हैं, भोजन से लेकर उसके रहने की पूरी सुविधा बिना कुछ लिये करते हैं। लेकिन बाहर से आने वाले कुछ व्यक्ति पहाड़ के लोगों के इसी सीधेपन का गलत फायदा उठाकर कर अपराध करते हैं और अपनी शाजिसों में कुछ लोगों को फंसा देते हैं। यह आज से नही दशकों से होता आ रहा है लेकिन पहाड़ का जनमानस थोड़े समय के लिए उद्वेलित होकर फिर अपने उसी स्वभाव में लौट जाता है और कुछ बाहरी तत्व अपनी शाजिसों में सक्रिय होकर जनधन की हानि इन लोगों को पहुंचाते रहते हैं। लेकिन पहाड़ के लोगों द्वारा सबकुछ जान समझ कर भी इनका कठोरता से प्रतिकार न किये जाने के कारण ये सक्रिय हैं और अपनी शाजिसों को अंजाम देते रहते हैं। सब लोग जानते हैं कि कौन-कौन लोग हैं जो पहाड़ के गांवों में शाजिसन अपराध कर रहे हैं। लेकिन कभी किसी ने चाहे शासन हो या प्रशासन कभी कठोर कदम नही उठाया और इसी का प्रतिफल है सतपुली में घटित हो रहे कुकृत्य।
लेकिन अब शायद सीमा पार होने लगी है। यदि अब भी उत्तराखण्ड का जनमानस नही जागा तो आने वाले समय में उनको जागने को मौका भी नही मिलेगा। यह बात सौ आने सच और खरी है कि जिस प्रकार से शाजिसन उत्तराखण्ड को घेरा जा रहा है, जिस प्रकार से कुछ नेता इस सबको हवा दे रहे हैं उससे आने वाले दिनों में पहाड़ की शान्त वादियों में शान्ति नही रहेगी। जिसका मुख्य कारण यहां के रैवासी दिनों दिन बाहर बस रहे हैं और बिना जांच परख के बाहरी तत्व पहाड़ के गांवों तक पहुंच चुके हैं। सभी आने वाले अपराधी नही होगे, सभी शाजिसन नही घुस रहे होंगे लेकिन अधिकांश तो इसी मानसिकता के हैं और जो नही हैं वे यहां के लोगों के शान्त स्वभाव और आसान शिकार होने के कारण अपराधी बन जाते हैं।
स्थानीय पुलिस प्रशासन भी स्थानीय लोगों पर ही अपना डंडा चलाता आया है। बाहरी अपराधियों से ये भी डरते हैं और कुछ राजनैतिक संरक्षण के कारण कुछ कर नही पाते। लेकिन अभी भी समय है समझने का और होशियार होने का। सतपुली से लेकर पौड़ी तक या उत्तरकाशी से लेकर गंगोत्री तक सब जगह अपराधी तत्व हाजिर हैं।
कहा जाता है कि उत्तरकाशी में तो एक जमाने में नगरपालिका के किसी तत्कालीन अध्यक्ष ने अपने वोट बैंक का मजबूत बनाने के लिए बाहरी लोगों को बसाया और उसके बाद किसी जिलाधिकारी ने इन बाहरी लोगों को जो जहां बसा था उसे वहीं जमीन का मालिकाना हक दिलवादिया और यही कारण है उत्तरकाशी बस अड्डे के पास बरूणावत पर्वत की तलहटी में सैकड़ों परिवार बसे हैं उनकी पूरी बस्ती है। उत्तरकाशी के दशहरा ग्राउंड में अवैध कब्जा आज भी है और कोई प्रशासनिक नुमाईंदा इनको हटाने का साहस नही कर सकता। बल्कि दिनों दिन और अधिक जमीन कब्जाई जा रही है। उत्तराखण्ड के तमाम शहरों और कस्बों में यही हाल है। गौ तस्करी से लेकर मानव तस्करी और चोरी सहित अन्य अपराध दिनोंदिन बढते जा रहे हैं। लेकिन कोई संज्ञान नही ले रहा है।
उत्तराखण्ड के जो लोग उत्तराखण्ड से बाहर बस गये हैं उनको भी मौके की नजाकत को समझना होगा। अपने घरगांव की सुध लेनी होगी। राजी-रोजगार के लिए बाहर जाना लाजमी है लेकिन अपनी पितृभूमि की अवहेलना किसी गंभीर संकट में डाल सकती है। इसलिए कोई कहीं भी रहे लेकिन पहाड़ हो आ रहे इस बदलाव और सामाजिक तानेबाने मे ंहो रहे बदलाव को समझना होगा। अपराधियों को किस कारण शह मिल रही है इसे समझना होगा और एकजुट होकर पहाड़ की वादियों को अशान्त होने से बचाना होगा।
अगर कोई ये सोचात है कि सतपुली में सुलग रही शाजिस की आग सिर्फ सतपुली को ही अपनी चपेट में लेगी यह मूर्खता के सिवा कुछ नही। उत्तराखण्ड में तमाम जगहों पर इस प्रकार की शाजिसें हो रही हैं लेकिन जनता से लेकर सरकार और शासन प्रशासन मौन है। सतपुली के बारे में तो यहां तक सुनने में आ रहा है कि स्थनीय पुलिस प्रशासन के दिग्गज अधिकारी अपराधियों के खिलाफ कार्यवाही करने में तो कोताही बरत रहे थे और स्थानीय लोगों को धमकाकर और लाठी चार्ज करते जबरन चुप कराने कोशिश कर रहे थे।
अभी भी समय है उत्तराखण्ड की शान्त वादियों को शाजिसों से महफूज रखा जाये अगर यह आग यों ही बढती रही तो फिर इसमें कौन-कौन जलेगा और कहां तक यह शाजिस की आग फैलेगी इसका आकलन करना आसान नही होगा। इसलिए अपराधियों को अपराध करने का इन्तजार न करके उसके फन को उठने से पहले ही कुचल दिया जाये तो अच्छा होगा। सतपुली के शैतानों को कानून तो सजा दे ही, सतपुली से ऐसे अपराधियों को बाहर निकाल फंेकना हेागा। अगर इन शैतानों पर यों ही हील हवाल होती रही तो फिर कल समझने और संभलने का मौका किसी को भी नही मिलेगा।
4/8/17

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

#वो_वार्ड_नो_3_की_दिवाली

वो उस दिन लेटा था 
बिस्तर पर मैं सुन रहा था 
वो दिवाली की रात 
धमाके पटाखों की 
एक चिंगारी उसकी जिंदगी पर 
भी आ गिरी थी 
साँसों की लड़ी 
जल रही थी अंदर उसके 
और धुँआ निकल रहा था 
मुँह से 
बनकर खून भरी उल्टियाँ 
उस रोज मेरा खून भी 
सुलगते लाल लोहे की तरह नजर आ रहा था 
तभी उसके दिल में 
एक जोर का धमाका हुआ 
मैं भी जोर से चीखा था उस दिन 
डॉक्टर्स को पहुंचा था लेने 
पर तब तक 
धड़कनों के चिथड़े उड़ चुके थे 
और बिखरी पड़ी 
खामोशियाँ 
मेरी देह के चारों ओर 
उसे दर्द से निजात मिल चुकी थी 
उस रोज मवॉर्ड no 3 में 
एक दीवाली मैंने भी मनाई थी 
जो आखिरी थी जिंदगी की 
उसकी 

शनिवार, 14 जून 2014

उसकी याद

मेरी तेरी आँखों की, वो दो-पल मुलाकात 
जैसे मिल गई मुझे कोई  बड़ी शोगात 
ना तुम ने कुछ कहा ना मैंने कुछ कहा 
बस यूँ ही इशारों-इशारों में बात हो चली 
तेरे वो खुले खुले लहराते  बाल 
कानो में वो लहराते झुमके 
ग्रीन चूड़ीदार हाथ 
 में लगे नील रंग के बाजु 
तेरे चहरे की  वो रंगत है  याद , 
मैंने दी थी तुझे एक लम्बी आवाज़
रुकी तू, ली थी तूने गहरी सी सांस 
कुछ अलग सा था तेरी आँखों में 
जैसे दर्द उभरा था तेरी बातों में 
मैं बनी जान के भी अनजान 
क्यूँ  बढ़ाऊ जान-पहचान आखिर 
क्या लगे तू मेरी
 हमारी मुलाकात थी आधी-अधूरी 
फिर जी चाहा, हाथ बढ़ा के रोक तू तुझ 
को पूछु, क्या लेना-देना तुझसे 
मुझ को तुम तो बस चली गई एक अहसास देके 
मेरी दुनिया में तू मीठे सपने लेकर आया थी 
 सपनो को सच करने की ख्वाहिश जगी  थी 
तेरी मेरी मुलाकात यादों के कुछ सुनहरे पल देकर गई 
अमानत बनकर जो मेरे पास हमेशा के लिये रह गई 
तेरे कंगना तेरे नथुनी तेरे झुमके सब चुप है
 फिर भी तेरे आँखों से हो गई बात 
जैसे मिल गई मुझे कोई  बड़ी शोगात