शनिवार, 14 जून 2014

उसकी याद

मेरी तेरी आँखों की, वो दो-पल मुलाकात 
जैसे मिल गई मुझे कोई  बड़ी शोगात 
ना तुम ने कुछ कहा ना मैंने कुछ कहा 
बस यूँ ही इशारों-इशारों में बात हो चली 
तेरे वो खुले खुले लहराते  बाल 
कानो में वो लहराते झुमके 
ग्रीन चूड़ीदार हाथ 
 में लगे नील रंग के बाजु 
तेरे चहरे की  वो रंगत है  याद , 
मैंने दी थी तुझे एक लम्बी आवाज़
रुकी तू, ली थी तूने गहरी सी सांस 
कुछ अलग सा था तेरी आँखों में 
जैसे दर्द उभरा था तेरी बातों में 
मैं बनी जान के भी अनजान 
क्यूँ  बढ़ाऊ जान-पहचान आखिर 
क्या लगे तू मेरी
 हमारी मुलाकात थी आधी-अधूरी 
फिर जी चाहा, हाथ बढ़ा के रोक तू तुझ 
को पूछु, क्या लेना-देना तुझसे 
मुझ को तुम तो बस चली गई एक अहसास देके 
मेरी दुनिया में तू मीठे सपने लेकर आया थी 
 सपनो को सच करने की ख्वाहिश जगी  थी 
तेरी मेरी मुलाकात यादों के कुछ सुनहरे पल देकर गई 
अमानत बनकर जो मेरे पास हमेशा के लिये रह गई 
तेरे कंगना तेरे नथुनी तेरे झुमके सब चुप है
 फिर भी तेरे आँखों से हो गई बात 
जैसे मिल गई मुझे कोई  बड़ी शोगात 

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

पहचान



पहचान
ये मेरी पहली कविता का कुछ अंश है बस एक प्रयास मात्र है सायद आप लोगो को पसंद आये ये भी जरुरी नहीं पर आपकी राय मेरे लिए बहुत जरुरी है
मित्रो काफी दिनों बाद में इस कहानी को पूरा कर पाया हूँ और इस का नाम है पहचान शायद आपको पसंद आये

उम्र 40 पार थी झुरियाँ भी नहीं थी पर देख कर लगता नहीं कि इनकी उम्र 40 हो सकती है क्यूँ कि आजकल तो मॉर्डन जमाना है अगर झुरिया हो भी तो भी नहीं दिखती हैं खेर झुरियाँ छोड़ देते है आते हैं मुद्दे पर

घर के गेट पर लगी नाम कि पटती से लगता है कि ये कोई भूतपूर्व राजनेता के घर है घर में कोई हलचन नहीं एक दम शांति जैसे किसी तूफान के आने से पहले समुंदर शांत दिखाई देता है वैसे ही आज इस घर कि शांति के देख कर लगता था पर ऐसा न भी हो सकता है इतने में उसी शांति को भंग करती हुई एक आवाज गूंजी, रामु कहाँ हो चाय का बोला था क्या चाय बगान से चाय लेने गया है क्या ? नहीं दीदी रसोई घर में छिपकली थी उसे भगा रहा था तुम को कितनी बार कहा है घर कि सफाई ढंग से किया करो छिपकली भागने कि जरुरत नहीं पड़ेगी दीदी सफाई तो करता ही हूँ आपको कितनी बार कहा है कि घर कि एक बार पुताई करवा लो आप मेरी सुनती कहा है हाँ तो ईद आने तो दो अबकी बार जरुर करवाउंगी दीदी आप बस ईद का बोल देती हैं पता नहीं वो ईद आपकी कब आयेगी 10 साल से तो आयी नहीं रामू तू आजकल बहुत ज्यादा बोलने लग गए हो जाओ काम करो अपना मेरा दिमाग ख़राब मत करो लाओ चाय इधर दो खड़े क्यूँ हो बुत कि तरह बस बातें तो तुम से कितनी करवा लो बस काम ही नहीं होता है एक चाय मंगवाई थी आधे घण्टे बाद लेके आया है और ऊपर से वो भी ठंडी रामू आज कोई चिट्ठी आयी है क्यूँ दीदी आपको पता नहीं अगर चिठ्ठी आयी होती तो में आपको देता नहीं तू अपनी बकवास बंद करेगा कि नहीं मैंने जो पूछा है वो बताओ दीदी मैनें तो इन 10 सालो में एक भी चिठ्ठी देखि नहीं इस घर में आयी हुई आप हर रोज ये ही क्यूँ पूछती हैं कुछ नहीं जाओ अपना काम करो मुझे ज्ञान मत तो। .... रामू के जाते ही हिना के चहरे पर एक उदासी सी झलकने लगी जैसे हर रोज रामू को चिठ्ठी का पूछने के बाद झलकती है आँखे देख कर लगता है जैसे बस अभी रोने वाली है पर पता नहीं आँखों से एक भी आंसू नहीं निकल रहा है आँखे भी लाल हो गई है पर आँसुओ का नामो-निशान नहीं है अभी तक सूरज ढल चूका है घर में भी अँधेरा धीरे धीरे दस्तक दे रहा है इतने में रामू अपने पैर पटकते हुवे और कुछ बड़बड़ाते हुवे आया एक घर कि लाइट भी नहीं जलाई जाती उस को भी मुझे ही जलाना पड़ेगा तभी जलेगी इस घर कि लाइट वैसे भी ये घर घर रहा कहाँ है भूतो के बंगलो जैसा तो हो गया है रामू तू फिर लग गया तेरे को नहीं जलनी लाइट तो मत जलाओ में खुद जला लू गई पर कोई भी काम कर के बोला मत करो मुझे बिलकुल पसंद नहीं है इतने में हिना और रामू कि आवाज़ को खामोश किया घर के टेलीफ़ोन कि घंटी ने रामू बोला ये भी में उठा के दू या आप टेलीफोन उठाओ गी हिना कुर्सी से उठी और टेलीफोन उठाया हल्लो कौन …। आप हिना जी बोल रही हैं ना। ............. हाँ जी आप कौन हो में आपकी शुभ -चिंतक ही हूँ अपना नाम बताओ मेरा नाम ह्हह्हह्हह्हह्ह बस इसी लिए तो मैंने आपको टेलीफोन किया है कि में कौन हूँ मेरी पहचान क्या हैं में नहीं पहचान ती आपको ? पहचानती तो में भी नहीं अपने आपको पर क्या करुँ कुछ लोग अपने मतलब से और अपने फायदे के लिए कुछ भी कर लेते हैं वो ये नहीं सोचते कि उसका नतीज़ा क्या होगा बस में वही नतीज़ा हूँ तुम मुझे ये बातें क्यूँ बोल रही हो में तो तुम को जानती नहीं हिना जी में जानती हूँ ना जरुरी नहीं कि हर कोई एक दूसरे को जाने आप तो मुझे पहले भी नहीं जानती थी और अब कैसे जानोगी में टेलीफोन रख रही हूँ हिना जी आप ऐसा जुल्म मत करना मेरे साथ मेरे साथ पहले भी आप एक जुल्म तो कर चुकी हो आपको मेरी पहचान चाहिए ना तो आप मुझे से बात तो करो तभी तो में अपनी पहचान दे पाऊँगी हिना जी इतनी देर में आप इतना तो समझ ही गई होंगी कि में आपको जानती हूँ तुम ज्यादा भाषण मत तो मुझे तू है कौन जल्दी बोलो हिना जी में आपको भाषण दे रही हूँ ? भाषण तो आप जैसे राजनेता लोग ही देते हैं ये मेरे बस कि बात नहीं हर एक चीज़ में भाषण देना और हर एक जगह राजनीती करना आप लोगो कि निति है हम आम लोगो कि नहीं आप लोग अपने ही बनाये रिश्तों में भी राजनीती का खेल खेलते हो अपने खून के रिश्ते पर अपनी राजनीती कि बिसात बिछाकर राजनीती का खेल खेलते हो पता नहीं इस ऊपर वाले के पास ये राजनेता बनाने वाली मिटटी कौन सी है आप लोगो में भी खून लाल ही होता है पर वो अपने खून का खून होते देख कर उबलता नहीं बस आप लोगो के खून में एक ही चीज़ और एक होती हैं राजनीति चाहे वो घर हो या चाहे देश और हिना जी आप मुझ से पहचान पूछ रही हैं आप ने मेरी पहचान बनाई नहीं वह भी आप ने राजनीती का गंदा खेल खेल लिया ईस से अच्छा होता आप मुझे पैदा ही नहीं करती पैदा होने से पहले मार देती मुझे से आप पहचान पूछती हो आप ने मुझे दर -दर हर -पल मरने और रोने के लिए पैदा किया और खुद मजे से वही राजनीती करने लग गई वो भी इस हिंदुस्तान कि खुद को पता नहीं कि में क्या कर रही हूँ वो इस देश कि राजनीती करेगी अगर प्यार ही करना था किसी से तो खुल के करो पयार करना तो पाप नहीं है पर अपने ही किये हुवे पाप को दुसरो के पले बांधना तो प्यार नहीं मर देती मुझे फैंक देती पैदा करते ही पर आपको तो वह भी राजनीती करनी थी फ़ोन कि कट चूका था पर अब भी हिना टेलीफोन के कान लगाये हुवे खड़ी थी एक पत्थर कि तरह न कोई हरकत न कुछ और रामू ने आवाज लगाई दीदी खाने में क्या बनाना है आलू तो हैं नहीं घर में , फिर आवाज लगाई , फिर आवाज लगाई आखिर रामू पास में जाकर बोला दीदी खाने में क्या बनाना है पर हिना कि तरफ से कोई हरकत नहीं रामू ने हिना के सामने जाकर हाथ लगाया तो हिना एक दम जैसे कही दूर से चल कर आयी हो ऐसे हिली बोली हेल्लो हेल्लो। ……। हेल्लो पर कोई आवाज न सुनकर रोने लग गई मुझे पता था एक ना एक दिन मेरे साथ ऐसा ही होने वाला था मेरा कोई कसूर नहीं मेरा कोई कसूर नहीं …………। क्रमश नमस्कार मित्रो मैंने कहानी तो पूरी लिखी है पर सोचा आप लोगो कि राय जान लू कि ये कहानी क़ैसी बन पड़ी है अपनी राय से मुझे जरुर अवगत करवाये क्रमश दिनेश परीक

सोमवार, 2 दिसंबर 2013

थोड़े से जाओगे

तुम  ने लेली  मुझ से विदा  पर तुम  ? 
  तुम चले तो जाओगे  पर
 तुम  रह  भी जाओगे  थोड़े  से
रह  जाता  है बारिश  होने के बाद 
हवा  में नमी 
आने के बाद अश्रु  आँखों  में नमी 
जैसे  रह जाता है  अँधेरे  में 
भी  उजाले  का अहसास  
रह  जाएँगी  वो संजोई  यादें 
रह  जाएँगी वो चांदनी  रातें 
रह  जाएँगी  वो अन  छुये  पल 
जो तुम ने मेरे साथ बिताये  थे ॥ 
जैसे रह  जाता है गाय  के थन  में 
निकल ने का बाद दूध 
रह  जाता है भोर  में चाँद  की 
चांदनी  का उजाला 
तुम भी रह  जाओगे थोड़े  से 
जैसे रह  जाता है 
वो पुराने खंडहर में 
निशानियों  का उजास 
रह  जाता है जैसे प्रीतम  मिलने 
 के   बाद भी बिछड़ने  का  गम 
रह  जाता  है बारिश  होने के बाद 
हवा  में नमी 
आने के बाद अश्रु  आँखों  में नमी 
जैसे  रह जाता है  अँधेरे  में 
भी  उजाले  का अहसास
तुम्हारे  पास  होने  का अहसास 
 तुम तो चले जाओगे 
और थोडा  सा  येही  रह जाओगे 

दिनेश पारीक 
क्रमश